Q . छोटे भाई ने अपनी पढाई का टाइम - टेबिल बनाते समय क्या - क्या सोचा और फिर उसका पालन क्यों नहीं कर पाया ?
A . टाइम - टेबिल (समय - सारणी) बनाते समय छोटे भाई ने सभी विषय के लिए टाईम - टेबिल बना डाली किन्तु स्वछंद स्वभाव के होने के कारण मित्रों के टोलियों के साथ घूमना, फुटबॉल एवं अन्य खेल में रूचि, पतंगबाज़ी तथा दीवार फाँदने जैसे विषय उसे अपनी ओर आकर्षित करते रहे, जिस वजह से वह अपने टाईम -टेबिल का पालन नहीं कर पाया।
Q . एक दिन जब गुल्ली - डंडा खेलने के बाद छोटा भाई बड़े भाई साहब के सामने पहुंचा तो उनकी क्या प्रतिक्रया हुई ?
A . एक दिन जब छोटा भाई गुल्ली - डंडा खेलकर ठीक रात के भोजन के समय घर पहुंचा, तो अपने बड़े भाई को बहुत क्रोधित देखा। बड़े भाई साहब उस पर टूट पड़े और कहने लगे कि उसे बिन पढ़ाई के अव्वल आने पर बहुत घमद हो गया है। इतना घमंड ठीक नहीं। अच्छे - अच्छे लोग घमंड की वजह से जीवन में विनाश हो गए हैं। सफल खिलाड़ी वही है , जो कभी नहीं हारता और उनका मानना था कि दादाजी की गाढ़ी कमाई का इस तरह दुरूपयोग करना ठीक नहीं। अगर गुल्ली - डंडा ही खेलना है तो छोटा भाई का घर वापस चले जाना ही ठीक होगा।
Q . बड़े भाई को अपने मन की इच्छाओं को क्यों दबानी पड़ती थीं ?
A . बड़े भाई को अपने बड़े होने के कारण छोटे भाई के लिए एक अच्छा आदर्श बनना पड़ता था , जिस कारण उन्हें अपनी इच्छाएँ जैसे खेल-कूद, मौज -मस्ती इत्यादि पर नियंत्रण रखना पड़ता था। उनका मानना था कि अगर वे स्वयं ही राह भटक जाएँ तो छोटे भाई का क्या होगा। इसलिए उन्हें अपने इच्छाओं को पढ़ाई की वेदी पर बलि चढ़ानी पड़ी क्योंकि वे जानते थे कि काफ़ी मुश्किलों के बाद ही दादाजी ने उन दोनों को पढ़ने के लिए भेजा था।
Q . बड़े भाई छोटे भी को क्या सलाह देते थे ?
A . बड़े भाई छोटे भाई को अधिकाधिक परिश्रम करने की सलाह देते थे। वे कहते थे कि बिना पढाई किए कोई एक बार ही उत्तीर्ण हो सकता है, किस्मत बार - बार साथ नहीं देती। खेल - कूद या अन्य मनोरंजन में बहुत ज़्यादा समय व्यर्थ करना ठीक नहीं। किताबों के साथ - साथ सांसारिक अनुभव का होना भी ज़रूरी है। पढ़ाई में अव्वल आने के लिए इच्छाओं पड़ता है, आँखें फोडनी पड़ती है , खून जलाना पड़ता है। घमंड करना अच्छी बात नहीं विनाश का कारण है।
Q . छोटे भाई ने बड़े भाई के नरम व्यवहार का क्या फायदा उठाया ?
A . जब एक बार फिर छोटा भाई पास और बड़ा भाई फ़ेल हो गया तो बड़े भाई के स्वभाव में काफ़ी नरमी आ गई. इसका छोटे भाई ने भरपूर फायदा उठाया। वह यह समझने लगा कि अब बिना पढाई किए ही वह पास हो सकता है. उसका सारा समय अब पतंगबाज़ी, मांझा बाँधने, कन्ने बाँधने , प्रतियोगिता की तैयारी आदि में बीतने लगा। उसके मन में अपने बड़े भाई दर और आदर धीरे - धीरे काम होने लगा।
Q . आपके विचार से क्या छोटे भाई अच्छे हैं या अपने बड़े भाई की वजह से पास हुए ?
A . छोटा भाई बहुत ही शैतान था। उसे एक घंटा भी पढ़ाई करना पहाड़ के समान लगता था। उसका मन हमेशा खेल - कूद, पतंगबाज़ी , ककरियाँ उछालना , चारदीवारी चढ़ना आदि में लगता था , किन्तु घंटा - दो घंटा बर्बाद करने के बाद बड़े भाई की डाँट -डपट सुनकर या सुनने के दर से वह खूब मन लगाकर परिश्रम करता था। यही कारण था कि काम समय पढ़ने के बाद भी वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो जाता. इसलिए मेरे विचार से उसकी सफलता में बड़े भाई की भूमिका अहम है।
Q . इस पाठ में लेखक ने समूची शिक्षा के बारे में क्या बताया है ?
A . "बड़े भाई साहब पाठ में लेखक ने समूची शिक्षा - प्रणाली पर व्यंग्य किया है। वे कहते हैं, कि तत्कालीन शिक्षा - पद्धति केवल किताबी ज्ञान पर ही जयादा ज़ोर देती है, वह बच्चों को रट्टा लगाने, तथा किताबी कीड़ा बनने में ही सहायता देती है। कई सौ सालों के पहले हुए ऐतिहासिक घटनाएँ , जियामेट्री, इत्यादि से केवल पुस्तकीय ज्ञान मिलता है किन्तु रोज़ - मर्रा के जीवन में वह कहाँ तक मदद करती है ? इसलिए खेल - कूद और अन्य नवीनतम पाठ्यक्रम, जो बच्चों में अनुशासन , सद्भावना, आपसी मेल - जोल को बढ़ावा दें ऐसी शिक्षा - पध्दति का होना आवाश्यक है, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान दें।
Q. बड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ कैसे आती है ?
A. बड़े भाई यह समझते हैं कि केवल आँकड़े कंठस्थ करने से जीवन की समझ नहीं आती बल्कि जीवन के अनुभवों से आती है। किताबी ज्ञान की सफलता की पहचान उसे व्यावहारिक जीवन में उपयोग करने से हिमिलतिहै। वे अपने दादाजी , माँ और प्रिंसिपल साहब की अनपढ़ माँ का उदाहरनदेते हुए कहते हैं कि उन सब का ज्ञान पढ़े - लिखे लोगों से कहीं अधिक है।
Q . बड़े भाई बार - बार फेल होने के बावजूद छोटे भाई को क्यों ठोकते हैं ?
A . बड़े भाई को छोटे भाई की चिंता है कि कहीं वो घमंड में आकर पढ़ना - लिखना छोड़ दे, तो वह भी फेल हो जाएगा। इसलिए उसकी भलाई के लिए वे उसे समय - समय पर डाँटते -फटकारते रहते हैं। वह प्यार से यह समझाते हैं कि केवल रट्टा मारने से कोई महान नहीं बन जाता वरन उसे किसी विषय का सम्पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी होने चाहिए और किस्मत बार - बार साथ नहीं देती।
Q . बड़े भाई साहब का स्वभाव कैसा था ?
A . वे उपदेश देने में निपुण थे। उनमे काफ़ी सयंम एवं आत्मनियंत्रण था। उनका विशवास था कि सफल होने के लिए मनुष्य को कुछ चीज़ों का त्याग करना पड़ता है। वे बहुत अध्ययनशील थे। वे बहुत परिश्रमी थे। वे बड़ों का बहुत आदर करते थे।
आशय स्पष्ट करो
Q . इम्तिहान पास कर लेना कोई आसान चीज़ नहीं। असली चीज़ है बुद्धि विकास।
A . बड़े भाई साहब की पढाई में अधिक रुचि होने के बावजूद वे बार - बार फेल हो जाते थे, वे इसका कारण शिक्षा - प्रणाली में पायी जाने वाली कमी को ठहराते थे। उनका मानना था कि केवल रट्टा मारने से कोई भी पास हो सकता है , किन्तु किसी विषय के बारे में पूरी जानकारी रखना जीवन में लाभदायक होता है। वह अपने छोटे भाई को समझाते हुए कहते थे कि उनके दादाजी, माँ तथा प्रिंसिपल साहब माँ, अनपढ़ होने के बावजूद दुनियादारी की थे। उनकी धारणा में किताबें पढ़कर केवल किताबी ज्ञान लेकिन दुनियादारी सीखने के लिए अनुभव आवश्यक है।
Q . फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच भी आदमी मोह माया के बंधन में जकड़ा रहता है , मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्कार न कर सकता था।
A . सभी को यह मालूम है कि कोई मौत से नहीं बच सकता , फिर भी हम कल के सपने और योजनाएं बना डालते हैं. मौत के आने पर सब कुछ ख़त्म हो जाता है , उसी तरह यह जानते हुए भी कि खेल - कूद में ज़्यादा देर रमे रहने से बड़े भाई की डाँट -फटकार सुननी पड़ेगी , लेखक की रुचि हमेशा उसी में लगी रहती थी।
Q . अगर बुनियाद ही पुख्ता न हो , तो मकान कैसे पायेदार बने ?
A . इमारत जितनी ऊंची हो उसकी बुनियाद उतनी ही गहरी होनी चाहिए , वर्ना वह दृढ़ता से खड़ा नहीं रह सकता। इसी तरह बड़े भाई साहब भी बार - बार फेल हो रहे थे जैसे अपनी शिक्षा की नींव काफ़ी गहरी दाल रहें हो। यह कथन उनकी असफलता पर व्यंग्य है।
Q . आँखें आसमान की और थीं मन उस आकाशगामी पथिक की और, हो मंद गति से झूमता पतन की और चला आ रहा था, मनो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नए संस्कार गर्हण करने जा रही हो।
A . एक दिन शाम के समय लेखक को आसमान में एक कटी पतंग दिखाई दी, उसे देखकर उन्हें ऐसा लगा मानो कोई संसार से छूटी एक आत्मा, विरक्त, मुक्त भाव से अपने धुन में चली जा रही हो, किसी नए संसार की ओर। फिर जैसे किसी नए जन्मे की तलाश में जैसे वापस आए उसी तरह वह सर्र से नीचे की ओर आने लगी। इसे देखते ही लेखक झटपट उसे लेने उस दिशा में दौड़ने लगे।
पाठ समाप्त।
स्नेहपपूर्वक,
सीता माँ ! :)
A . टाइम - टेबिल (समय - सारणी) बनाते समय छोटे भाई ने सभी विषय के लिए टाईम - टेबिल बना डाली किन्तु स्वछंद स्वभाव के होने के कारण मित्रों के टोलियों के साथ घूमना, फुटबॉल एवं अन्य खेल में रूचि, पतंगबाज़ी तथा दीवार फाँदने जैसे विषय उसे अपनी ओर आकर्षित करते रहे, जिस वजह से वह अपने टाईम -टेबिल का पालन नहीं कर पाया।
Q . एक दिन जब गुल्ली - डंडा खेलने के बाद छोटा भाई बड़े भाई साहब के सामने पहुंचा तो उनकी क्या प्रतिक्रया हुई ?
A . एक दिन जब छोटा भाई गुल्ली - डंडा खेलकर ठीक रात के भोजन के समय घर पहुंचा, तो अपने बड़े भाई को बहुत क्रोधित देखा। बड़े भाई साहब उस पर टूट पड़े और कहने लगे कि उसे बिन पढ़ाई के अव्वल आने पर बहुत घमद हो गया है। इतना घमंड ठीक नहीं। अच्छे - अच्छे लोग घमंड की वजह से जीवन में विनाश हो गए हैं। सफल खिलाड़ी वही है , जो कभी नहीं हारता और उनका मानना था कि दादाजी की गाढ़ी कमाई का इस तरह दुरूपयोग करना ठीक नहीं। अगर गुल्ली - डंडा ही खेलना है तो छोटा भाई का घर वापस चले जाना ही ठीक होगा।
Q . बड़े भाई को अपने मन की इच्छाओं को क्यों दबानी पड़ती थीं ?
A . बड़े भाई को अपने बड़े होने के कारण छोटे भाई के लिए एक अच्छा आदर्श बनना पड़ता था , जिस कारण उन्हें अपनी इच्छाएँ जैसे खेल-कूद, मौज -मस्ती इत्यादि पर नियंत्रण रखना पड़ता था। उनका मानना था कि अगर वे स्वयं ही राह भटक जाएँ तो छोटे भाई का क्या होगा। इसलिए उन्हें अपने इच्छाओं को पढ़ाई की वेदी पर बलि चढ़ानी पड़ी क्योंकि वे जानते थे कि काफ़ी मुश्किलों के बाद ही दादाजी ने उन दोनों को पढ़ने के लिए भेजा था।
Q . बड़े भाई छोटे भी को क्या सलाह देते थे ?
A . बड़े भाई छोटे भाई को अधिकाधिक परिश्रम करने की सलाह देते थे। वे कहते थे कि बिना पढाई किए कोई एक बार ही उत्तीर्ण हो सकता है, किस्मत बार - बार साथ नहीं देती। खेल - कूद या अन्य मनोरंजन में बहुत ज़्यादा समय व्यर्थ करना ठीक नहीं। किताबों के साथ - साथ सांसारिक अनुभव का होना भी ज़रूरी है। पढ़ाई में अव्वल आने के लिए इच्छाओं पड़ता है, आँखें फोडनी पड़ती है , खून जलाना पड़ता है। घमंड करना अच्छी बात नहीं विनाश का कारण है।
Q . छोटे भाई ने बड़े भाई के नरम व्यवहार का क्या फायदा उठाया ?
A . जब एक बार फिर छोटा भाई पास और बड़ा भाई फ़ेल हो गया तो बड़े भाई के स्वभाव में काफ़ी नरमी आ गई. इसका छोटे भाई ने भरपूर फायदा उठाया। वह यह समझने लगा कि अब बिना पढाई किए ही वह पास हो सकता है. उसका सारा समय अब पतंगबाज़ी, मांझा बाँधने, कन्ने बाँधने , प्रतियोगिता की तैयारी आदि में बीतने लगा। उसके मन में अपने बड़े भाई दर और आदर धीरे - धीरे काम होने लगा।
Q . आपके विचार से क्या छोटे भाई अच्छे हैं या अपने बड़े भाई की वजह से पास हुए ?
A . छोटा भाई बहुत ही शैतान था। उसे एक घंटा भी पढ़ाई करना पहाड़ के समान लगता था। उसका मन हमेशा खेल - कूद, पतंगबाज़ी , ककरियाँ उछालना , चारदीवारी चढ़ना आदि में लगता था , किन्तु घंटा - दो घंटा बर्बाद करने के बाद बड़े भाई की डाँट -डपट सुनकर या सुनने के दर से वह खूब मन लगाकर परिश्रम करता था। यही कारण था कि काम समय पढ़ने के बाद भी वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो जाता. इसलिए मेरे विचार से उसकी सफलता में बड़े भाई की भूमिका अहम है।
Q . इस पाठ में लेखक ने समूची शिक्षा के बारे में क्या बताया है ?
A . "बड़े भाई साहब पाठ में लेखक ने समूची शिक्षा - प्रणाली पर व्यंग्य किया है। वे कहते हैं, कि तत्कालीन शिक्षा - पद्धति केवल किताबी ज्ञान पर ही जयादा ज़ोर देती है, वह बच्चों को रट्टा लगाने, तथा किताबी कीड़ा बनने में ही सहायता देती है। कई सौ सालों के पहले हुए ऐतिहासिक घटनाएँ , जियामेट्री, इत्यादि से केवल पुस्तकीय ज्ञान मिलता है किन्तु रोज़ - मर्रा के जीवन में वह कहाँ तक मदद करती है ? इसलिए खेल - कूद और अन्य नवीनतम पाठ्यक्रम, जो बच्चों में अनुशासन , सद्भावना, आपसी मेल - जोल को बढ़ावा दें ऐसी शिक्षा - पध्दति का होना आवाश्यक है, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान दें।
Q. बड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ कैसे आती है ?
A. बड़े भाई यह समझते हैं कि केवल आँकड़े कंठस्थ करने से जीवन की समझ नहीं आती बल्कि जीवन के अनुभवों से आती है। किताबी ज्ञान की सफलता की पहचान उसे व्यावहारिक जीवन में उपयोग करने से हिमिलतिहै। वे अपने दादाजी , माँ और प्रिंसिपल साहब की अनपढ़ माँ का उदाहरनदेते हुए कहते हैं कि उन सब का ज्ञान पढ़े - लिखे लोगों से कहीं अधिक है।
Q . बड़े भाई बार - बार फेल होने के बावजूद छोटे भाई को क्यों ठोकते हैं ?
A . बड़े भाई को छोटे भाई की चिंता है कि कहीं वो घमंड में आकर पढ़ना - लिखना छोड़ दे, तो वह भी फेल हो जाएगा। इसलिए उसकी भलाई के लिए वे उसे समय - समय पर डाँटते -फटकारते रहते हैं। वह प्यार से यह समझाते हैं कि केवल रट्टा मारने से कोई महान नहीं बन जाता वरन उसे किसी विषय का सम्पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी होने चाहिए और किस्मत बार - बार साथ नहीं देती।
Q . बड़े भाई साहब का स्वभाव कैसा था ?
A . वे उपदेश देने में निपुण थे। उनमे काफ़ी सयंम एवं आत्मनियंत्रण था। उनका विशवास था कि सफल होने के लिए मनुष्य को कुछ चीज़ों का त्याग करना पड़ता है। वे बहुत अध्ययनशील थे। वे बहुत परिश्रमी थे। वे बड़ों का बहुत आदर करते थे।
आशय स्पष्ट करो
Q . इम्तिहान पास कर लेना कोई आसान चीज़ नहीं। असली चीज़ है बुद्धि विकास।
A . बड़े भाई साहब की पढाई में अधिक रुचि होने के बावजूद वे बार - बार फेल हो जाते थे, वे इसका कारण शिक्षा - प्रणाली में पायी जाने वाली कमी को ठहराते थे। उनका मानना था कि केवल रट्टा मारने से कोई भी पास हो सकता है , किन्तु किसी विषय के बारे में पूरी जानकारी रखना जीवन में लाभदायक होता है। वह अपने छोटे भाई को समझाते हुए कहते थे कि उनके दादाजी, माँ तथा प्रिंसिपल साहब माँ, अनपढ़ होने के बावजूद दुनियादारी की थे। उनकी धारणा में किताबें पढ़कर केवल किताबी ज्ञान लेकिन दुनियादारी सीखने के लिए अनुभव आवश्यक है।
Q . फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच भी आदमी मोह माया के बंधन में जकड़ा रहता है , मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्कार न कर सकता था।
A . सभी को यह मालूम है कि कोई मौत से नहीं बच सकता , फिर भी हम कल के सपने और योजनाएं बना डालते हैं. मौत के आने पर सब कुछ ख़त्म हो जाता है , उसी तरह यह जानते हुए भी कि खेल - कूद में ज़्यादा देर रमे रहने से बड़े भाई की डाँट -फटकार सुननी पड़ेगी , लेखक की रुचि हमेशा उसी में लगी रहती थी।
Q . अगर बुनियाद ही पुख्ता न हो , तो मकान कैसे पायेदार बने ?
A . इमारत जितनी ऊंची हो उसकी बुनियाद उतनी ही गहरी होनी चाहिए , वर्ना वह दृढ़ता से खड़ा नहीं रह सकता। इसी तरह बड़े भाई साहब भी बार - बार फेल हो रहे थे जैसे अपनी शिक्षा की नींव काफ़ी गहरी दाल रहें हो। यह कथन उनकी असफलता पर व्यंग्य है।
Q . आँखें आसमान की और थीं मन उस आकाशगामी पथिक की और, हो मंद गति से झूमता पतन की और चला आ रहा था, मनो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नए संस्कार गर्हण करने जा रही हो।
A . एक दिन शाम के समय लेखक को आसमान में एक कटी पतंग दिखाई दी, उसे देखकर उन्हें ऐसा लगा मानो कोई संसार से छूटी एक आत्मा, विरक्त, मुक्त भाव से अपने धुन में चली जा रही हो, किसी नए संसार की ओर। फिर जैसे किसी नए जन्मे की तलाश में जैसे वापस आए उसी तरह वह सर्र से नीचे की ओर आने लगी। इसे देखते ही लेखक झटपट उसे लेने उस दिशा में दौड़ने लगे।
पाठ समाप्त।
स्नेहपपूर्वक,
सीता माँ ! :)
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