दोहे
सोहत ओढैं पितु पटु स्याम, सलौने गात।
मनो नीलमनि - सैल पर आतपु परयौ प्रभात।।
भावार्थ : इस दोहे में बिहारी (दोहाकार) दो सखियों के बीच भगवान् श्री कृष्ण को लेकर हुए बातचीत को प्रस्तुत कर रहें हैं। एक सखी अपने दूसरी सखी से श्याम (स्याम) की अलौकिक सुंदरता का वर्णन करते हुए कहती है कि श्याम जो नीले (साँवले ) रंग के हैं, उन पर यह पीला वस्त्र उनकी सुंदरता को चार चाँद लगाए हुए है जैसे सुबह की पहली पिली किरणें नीलमणि पर्वत को सुशोभित कर रहीं हैं।
कहलाने एकत बसत अहि मयूर, मृग बाघ।
जगतु तपोबन सौ कियौ दीरघ - दाघ निदाघ ।।
गर्मी एक ऐसी ऋतु है जब सारे जीव छाया एवं ठंडक तो तरस जाते हैं। जंगल के कुछ नियम हैं , शिकारी और शिकार एक साथ कभी नहीं दिखाई पड़ता, किन्तु भीषण गर्मी में जब सब छाँव को तरस जाते हैं , तब एकसाथ दिखाई पड़ता हैं। सब का प्राण मानो सूख सा गया है , किसी को भी नियम का ध्यान नहीं।
बतरस - लालच लाल की मुरली धरी लुकाई ।
सौंह करैं भौंहनु हंसै , देन कहैं नटि जाइ ।।
कृष्ण सदैव अपनी मुरली (बाँसुरी ) से चिपके रहते हैं। इससे खीझ कर गोपियाँ उनकी बाँसुरी छुपा देतीं हैं , जब कृष्ण उनसे पूछते हैं तो वह सौगंध खाती है कि इस बारे में उन्हें कुछ नहीं पता, किन्तु उनके मुस्कुराते चेहरों से यह साफ़ झलकता है कि यह काम उन्हीं का है। जब कृष्ण उनसे बाँसुरी की मांग करते हैं तो वे साफ़ मना कर देती हैं। वे केवल इतना चाहती हैं कि कृष्ण उन्हें भी थोड़ा समय दें, उनसे भी बात करें ।
कहत , नटत , रीझत , खिझत , मिलत , खिलत , लजियात।
भरै भौन में करत हैं , नैननु ही, सब बात ।।
बिहारी यहाँ प्रणय रास का वर्णन कर रहें हैं। दो प्रेमियों को मुँह से बात करने की आवश्यकता नहीं, आँखों की भाषा ही काफी है। भरे भवन, लोगों की भीड़ में , प्रेमी , प्रेमिका को आँखों से इशारे करते हुए अपने समीप बुलाता है। प्रेमिका तुरन्त मना कर देती है, उसके इस ढंग से प्रेमी खुश हो जाता है, यह देखकर वह खीझ (गुस्सा) जाती है। फिर दोनों आँखों से बात करते हुए इस कलह को भूल जाते हैं , इस तरह भरी भीड़ में भी दोनों एक दूसरे से बात करने में सक्षम हैं।
बैठि रही अति सघन बन , पैठि सदन - तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की छाहौं चाहति छाँह ।।
जेठ का महीना काफी कष्टदायक होता है, ऐसे में लोग घर से बाहर जाने को मना कर देते हैं , अच्छाई इसी में है कि सब घर में अधिक समय बिताएँ। सूरज सीधा सर के ऊपर होता है और किसी भी वस्तु की छाया धरती पर नहीं पड़ती। सब को शीतलता देने वाली वृक्ष, घरों आदि की छाया भी गायब हैं , ऐसा लगता है कि मानो छाया भी छाया को तरस गई हो।
कागद पर लिखत न बनत , कहत सँदेसु लजात।
कहिहै सब तेरौ हियौ , मेरे हिय की बात ।।
यहां पर प्रेमिका के ह्रदय - भाव जो अपने नायक से बिछुड़ने पर तड़प रही है, उसका वर्णन है। वह कहती है कि तुमसे बिछड़ने पर मुझे कुछ भी नहीं भा रहा. पर मैं अपने भावों को लज्जावश कागज़ में शब्द - रूप नहीं दे पा रही , अगर लिखना भी चाहूँ तो काँपते हुए, पसीने से भरे हाथ और आँसुओं से भरी आँखें मुझे लिखने नहीं दे रहीं। तुम्हारी भी तो यही दशा है, तुम मेरे विरह (pangs of separation) को क्यों नहीं समझ पा रहे ?
प्रगट भए द्विजराज - कुल, सुबस बजे ब्रज आइ।
मेरे हरौ कलेस सब, केसव केसवराइ ।।
कवि इस दोहे में भगवान् श्री कृष्ण को अपना पिता - समान , सम्मान देते हुए यह कह रहे हैं कि , तुम अपनी इच्छा से चंद्रकुल में उत्पन्न हुए, तुमहारे कोई बात मुश्किल नहीं। हे ब्रजवासी! तुम मेरे पिता-समान हो, मेरे संरक्षक हो, मेरी पीड़ा भी हरो, (दूर करो) .
जपमाला , छापैं , तिलक सरै न एकौ कामु ।
मन-काँचै नाचै बृथा , साँचै राँचै रामु ।।
हाथ में जपमाला लेकर उपरवाले का नाम जपना, गेरुए वस्त्र धरना, शरीर पर चन्दन मलना, तिलक आदि धारण करना, यह सब बाहरी वेश, हैं, ये सब दिखावा है , अगर मन में ईश्वर का निवास न हो। इसे भक्ति नहीं कही जा सकती अगर हम व्यर्थ दिखावे में अपना समय नष्ट करें. भगवान केवल सच्ची भक्ति को ही मानते हैं, जैसे राम ने शबरी के जूठे फल में छिपी अनन्य भक्ति को ही देखी।
समाप्त
सीता लक्ष्मी :)