प्र वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में क्या परिवर्तन आया ?
उ वामीरो से मिलने के बाद तताँरा का जीवन बिल्कुल बदल गया। उसके मन में हर क्षण तताँरा की तस्वीर ही घूमती रहती। उसेक मन वामीरो को लेकर कई कल्पानाएँ रचने लगा। उसके जीवन में ऐसा पहली बार हुआ कि उसका मन इतना विचलित था। उसे हर पल पहाड़ जैसे भारी लगने लगा। वह शाम होने से पहले ही लपाती की उस समुद्री चट्टान पर जा कर बैठ जाता और वामीरो के आने की प्रतीक्षा करता रहता।
प्र प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए किस आयोजन किए जाते थे ?
उ प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ति - प्रदर्शन के लिए पशु - पर्व का अतिरिक्त कुश्ती और मेलों का भी आयोजन होता था। पशु - हृष्ट - पुष्ट पशुओं का प्रदर्शन किया जाता। था युवक पशुओं से अपने बल की परीक्षा
करते थे , पशुओं को भी आपस में भिड़ाया जाता था। इसमें सभी गाँववाले भाग लेते थे। प्रतियोगिताओं के बाद नृत्य - संगीत एवं भोजन का भी आयोजन किया जाता था।
प्र रूढ़ियाँ जब बंधन बन बोझ बनने लगे तब उनका टूट जाना ही अच्छा है। क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उ हमारे पूर्वजों ने अपने समयानुसार सोच - समझकर कुछ रीतियाँ ऐसी बनाई हैं जो आजतक मान्य हैं, उनका पालन करना न केवल हमारा कर्तव्य है वरन उसमे हमारी भलाई भी है , जैसे मौसम के अनुसार कुछ त्यौहार और उनसे जुड़े खान - पान एवं संस्कृतियाँ , किन्तु कुछ रीतियाँ अब के समय के अनुसार बिलकुल ठीक नहीं , जैसे औरतों का घर से बाहर न निकलना। आज के युग में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही समाज की उन्नति में सम भागीदार हैं। तो हमें चाहिए कि अपनी बुद्धि का उपयोग करें और केवल उन्हीं रिवाजों को अपनाए जो आज के वक़्त के लिए ठीक हों। तो यह कहना सही होगा कि जब रूढ़ियाँ बंधन बन जाएँ तो उनका टूट जाना ही अच्छा है।
प्र जब कोई राह नहीं सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसमे (तलवार) शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा।
उ गाँववालों और तताँरा के माँ द्वारा किए गए अपमान से वामीरो बहुत क्रोधित हुआ। उसका क्रोध बढ़ता ही गया, अपने क्रोध को शाँत करने के लिए उसने अपनी पूरी ताक़त से तलवार धरती के साइन में उतार दिया, जिससे धरती दो टुकड़ों में बँट गई और फिर वह अपनी तलवार को वापस खींचने लगा। वह ऐसा इसलिए कर रहा था क्योंकि उसे लगा कि ऐसा करने से उसका अपमान जिस धरती पर हुआ उसे मिटा रहा हो।
प्र बस आस की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी।
उ तताँरा को भी वामीरो से बहुत प्यार हो चुका था। वह उसकी प्रतीक्षा में समुद्र किनारे आस लगाए बैठी थी। वे दोनों फिर उसी संदरी चट्टान के पास मिलने वाले थे, जहाँ पहले मिले थे। किन्तु समय के साथ - साथ उसका अधीर मन अपनी आशा खो रहा था। साथ ही साथ आशा की एक किरण भी थी कि वामीरो अवश्य आएगा। सूरज की डूबती हुई किरणों के साथ उसे अपनी आशा भी डूबती नज़र आ रही थीं।
समाप्त :-)
Seetha Lakshmi . :-)
०४-०८-२०१६
उ वामीरो से मिलने के बाद तताँरा का जीवन बिल्कुल बदल गया। उसके मन में हर क्षण तताँरा की तस्वीर ही घूमती रहती। उसेक मन वामीरो को लेकर कई कल्पानाएँ रचने लगा। उसके जीवन में ऐसा पहली बार हुआ कि उसका मन इतना विचलित था। उसे हर पल पहाड़ जैसे भारी लगने लगा। वह शाम होने से पहले ही लपाती की उस समुद्री चट्टान पर जा कर बैठ जाता और वामीरो के आने की प्रतीक्षा करता रहता।
प्र प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए किस आयोजन किए जाते थे ?
उ प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ति - प्रदर्शन के लिए पशु - पर्व का अतिरिक्त कुश्ती और मेलों का भी आयोजन होता था। पशु - हृष्ट - पुष्ट पशुओं का प्रदर्शन किया जाता। था युवक पशुओं से अपने बल की परीक्षा
करते थे , पशुओं को भी आपस में भिड़ाया जाता था। इसमें सभी गाँववाले भाग लेते थे। प्रतियोगिताओं के बाद नृत्य - संगीत एवं भोजन का भी आयोजन किया जाता था।
प्र रूढ़ियाँ जब बंधन बन बोझ बनने लगे तब उनका टूट जाना ही अच्छा है। क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उ हमारे पूर्वजों ने अपने समयानुसार सोच - समझकर कुछ रीतियाँ ऐसी बनाई हैं जो आजतक मान्य हैं, उनका पालन करना न केवल हमारा कर्तव्य है वरन उसमे हमारी भलाई भी है , जैसे मौसम के अनुसार कुछ त्यौहार और उनसे जुड़े खान - पान एवं संस्कृतियाँ , किन्तु कुछ रीतियाँ अब के समय के अनुसार बिलकुल ठीक नहीं , जैसे औरतों का घर से बाहर न निकलना। आज के युग में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही समाज की उन्नति में सम भागीदार हैं। तो हमें चाहिए कि अपनी बुद्धि का उपयोग करें और केवल उन्हीं रिवाजों को अपनाए जो आज के वक़्त के लिए ठीक हों। तो यह कहना सही होगा कि जब रूढ़ियाँ बंधन बन जाएँ तो उनका टूट जाना ही अच्छा है।
प्र जब कोई राह नहीं सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसमे (तलवार) शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा।
उ गाँववालों और तताँरा के माँ द्वारा किए गए अपमान से वामीरो बहुत क्रोधित हुआ। उसका क्रोध बढ़ता ही गया, अपने क्रोध को शाँत करने के लिए उसने अपनी पूरी ताक़त से तलवार धरती के साइन में उतार दिया, जिससे धरती दो टुकड़ों में बँट गई और फिर वह अपनी तलवार को वापस खींचने लगा। वह ऐसा इसलिए कर रहा था क्योंकि उसे लगा कि ऐसा करने से उसका अपमान जिस धरती पर हुआ उसे मिटा रहा हो।
प्र बस आस की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी।
उ तताँरा को भी वामीरो से बहुत प्यार हो चुका था। वह उसकी प्रतीक्षा में समुद्र किनारे आस लगाए बैठी थी। वे दोनों फिर उसी संदरी चट्टान के पास मिलने वाले थे, जहाँ पहले मिले थे। किन्तु समय के साथ - साथ उसका अधीर मन अपनी आशा खो रहा था। साथ ही साथ आशा की एक किरण भी थी कि वामीरो अवश्य आएगा। सूरज की डूबती हुई किरणों के साथ उसे अपनी आशा भी डूबती नज़र आ रही थीं।
समाप्त :-)
Seetha Lakshmi . :-)
०४-०८-२०१६