अब कहाँ दूसरों के दुःख से दुखी होनेवाले
लेखक की माँ ने पूरे दिन का रोज़ा क्यों रखा ?
लेखक की माँ कबूतर के अंडे बचाना चाहती थी, पर जब वह उसे एक सुरक्षित स्थान पर रखने की प्रयास में थीं, वह उनके हाथ से वह छूट कर टूट गया। इसी पाप का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने पूरे दिन रखा।
लेखक ने ग्वालियर से मुम्बई तक किन बदलावों को महसूस किया ?
लेखक ने लुप्त होती हुई हरियाली देखी , अब हर जगह इमारतें ही इमारतें थीं, जहाँ पहले जंगल थे, उन्हें अब काटकर सड़कें बना दी गईं , मनुष्य केवल अपना स्वार्थ देखता है , प्रकृति का कोई मोल नहीं।
'डेरा डालने' से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट कीजिए।
'डेरा डालने' का मतलब है किसी और के घर को अपना समझ वहाँ बस जाना। पेड़ों के काटने की वजह से पशु - पक्षियों से उनका बसेरा छिन गया और वे मनुष्यों के घरों में घोंसले बनाकर, 'डेरा डालने' लगे।
शेख अयाज़ के पिता ने अपने बाजू पर काला च्योंटा रेंगता देख भोजन छोड़कर क्यों उठ खड़े हुए ?
पुराने ज़माने के घरों में कुआँ हुआ करता था, जहाँ लोग अपने हाथ - पैर धोने के बाद ही भोजन करते थे. जब शेख अयाज़ के पिता ने अपने बाजू पर एक काले च्योंटे को देखा तो वे तुरंत उसे उसके घर, यानि कि कुँए तक छोड़ने गए।
आशय स्पष्ट
नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले बम्बई में देखने को मिला था।
प्रकृति माँ - समान सभी प्राणियों का पोषण करती है , वह बदले में कुछ नहीं चाहती, किन्तु मनुष्य ने जब से अपने स्वार्थपूर्ति के लिए पेड़ काटना, जंगल साफ़ करना शुरू किया वह थोड़ा खीझ सी गई है , कुछ साल पहले बम्बई में आए तूफ़ान इसका एक उदाहरण है। समुद्रतट पर बनाए गए इमारतों की वजह से लहरों ने तीन जहाज़ों को बम्बई के तीन अलग - अलग जगहों पर पटक दिया। लोग इस तरह घायल हुए कि घाव भरने में काफी वक़्त लगा।
जो जितना बड़ा होता है उसे उतना ही काम गुस्सा आता है।
बड़े - बड़े बिल्डर समुद्र को क्यों पीछे धकेल रहे थे ?
बड़े - बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे धकेल रहे थे ताकि उस जगह पर भी बड़ी - बड़ी इमारतें बना सकें।
लेखक का घर किस शहर में था ?
लेखक का घर ग्वालियर में था, किन्तु नौकरी उन्हें मुम्बई ले आई थी।
जीवन कैसे घरों में सिमटने लगा है ?
सयुंक्त परिवार का चलन रहते लोग बड़े - बड़े घरों में अपने सभी रिश्तेदारों के साथ एक ही चाट के नीचे रहते थे , किन्तु परिवारों के सिकुड़ने के साथ - साथ लोगों के दिलों में भी जगह काम हुई और सब डिब्बे जैसे घरों में रहने लगे हैं।
कबूतर परेशानी में इधर - उधर क्यों फड़फड़ा रहे थे ?
कबूतर ने अपने घोंसले में दो अंडे दिए थे , एक को तो बिल्ली खा गई और दुसरा लेखक की माँ के हाथों टूट गया , इसलिए कबूतर परेशान थे।
लिखित
अरब में लश्कर को नूह के नाम से क्यों याद करते हैं ?
"नूह" का मतलब मसीहा है , वे एक दरियादिल इंसान थे। एक बार एक कुत्ते ने उन्हें दुत्कारा इस कारण वे अपनी गलती को सोच - सोच रोते रहे, इसलिए उन्हें नूह का नाम मिला।
लेखक की माँ किस समय पेड़ों के पत्ते तोड़ने के लिए मना करती थीं और क्यों ?
लेखक की माँ सूर्यास्त के बाद पत्ते तोड़ने को मना करती थीं , उनका मानना था कि इससे पेड़ों को दर्द होता है, जिससे वे रोएँगे और बद्दुआ देंगे।
प्रकृति में आए असंतुलन का क्या परिणाम हुआ ?
प्रकृति में असुंतलन के कारण मौसम - चक्र में बहुत परिवर्तन हुआ। गर्मी का प्रचंड प्रकोप , समय - असमय वर्षा होना , तूफ़ान , बाढ़, भूकंप और नए - नए रोगों की उत्पत्ति।
लेखक की माँ ने पूरे दिन का रोज़ा क्यों रखा ?
लेखक की माँ कबूतर के अंडे बचाना चाहती थी, पर जब वह उसे एक सुरक्षित स्थान पर रखने की प्रयास में थीं, वह उनके हाथ से वह छूट कर टूट गया। इसी पाप का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने पूरे दिन रखा।
लेखक ने ग्वालियर से मुम्बई तक किन बदलावों को महसूस किया ?
लेखक ने लुप्त होती हुई हरियाली देखी , अब हर जगह इमारतें ही इमारतें थीं, जहाँ पहले जंगल थे, उन्हें अब काटकर सड़कें बना दी गईं , मनुष्य केवल अपना स्वार्थ देखता है , प्रकृति का कोई मोल नहीं।
'डेरा डालने' से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट कीजिए।
'डेरा डालने' का मतलब है किसी और के घर को अपना समझ वहाँ बस जाना। पेड़ों के काटने की वजह से पशु - पक्षियों से उनका बसेरा छिन गया और वे मनुष्यों के घरों में घोंसले बनाकर, 'डेरा डालने' लगे।
शेख अयाज़ के पिता ने अपने बाजू पर काला च्योंटा रेंगता देख भोजन छोड़कर क्यों उठ खड़े हुए ?
पुराने ज़माने के घरों में कुआँ हुआ करता था, जहाँ लोग अपने हाथ - पैर धोने के बाद ही भोजन करते थे. जब शेख अयाज़ के पिता ने अपने बाजू पर एक काले च्योंटे को देखा तो वे तुरंत उसे उसके घर, यानि कि कुँए तक छोड़ने गए।
आशय स्पष्ट
नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले बम्बई में देखने को मिला था।
प्रकृति माँ - समान सभी प्राणियों का पोषण करती है , वह बदले में कुछ नहीं चाहती, किन्तु मनुष्य ने जब से अपने स्वार्थपूर्ति के लिए पेड़ काटना, जंगल साफ़ करना शुरू किया वह थोड़ा खीझ सी गई है , कुछ साल पहले बम्बई में आए तूफ़ान इसका एक उदाहरण है। समुद्रतट पर बनाए गए इमारतों की वजह से लहरों ने तीन जहाज़ों को बम्बई के तीन अलग - अलग जगहों पर पटक दिया। लोग इस तरह घायल हुए कि घाव भरने में काफी वक़्त लगा।
जो जितना बड़ा होता है उसे उतना ही काम गुस्सा आता है।
विशाल - हृदय वाला व्यक्ति सदैव सभी की मंगलकामना करता है , शीघ्र क्षमा करता है, बहुत सहता है पर क्रोध काम करता है किन्तु जब उसकी इसी सहनशीलता का लोग गलत प्रयोग करते हैं तो उसके क्रोध की सीमा नहीं रहती। यहाँ समुद्र के लिए ऐसा उदाहरण दिया गया है , जो कुछ समय तक अपने तट पर बनते इमारत को देखता रहा , पर तूफ़ान आने पर उसने अपना असली प्रभाव दिखा ही दिया।
इस बस्ती ने न जाने कितने परिंदों-चरिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमे से कुछ शहर छोड़कर चले जो नहीं जा सके हैं उन्होंने यहाँ - वहाँ डेरा दाल लिया है।
इसका आशय यह है कि प्रकृति में सब के लिए स्थान है , हार कोई शान्तिपूर्वक एकता से रह सकता है किन्तु मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो अधिकाधिक धन जुटाने की होड़ में दूसरों के स्थान पर क़ब्ज़ा करता है , जैसे पेड़ और पक्षियों और पशुओं का निवास स्थान है उसे काट कर वहाँ अपने लिए घर और व्यापार की सीमा बढ़ाना इत्यादि। इस कारण इन प्राणियों ने या तो अपना घर बदल दिया मनुष्य इ बनाए इस घर या इमारत पर डेरा दाल दिया।
शेख अयाज़ के पिता बोले, "नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घरवाले को बेघर कर। उस बेघर को कुऍं पर उसके जा रहा हूँ। इन छिपी हुई उनकी भावना को स्पष्ट कीजिए।
शेख अयाज़ के पिता बहुत दयालु थे, एक बार भोजन करते समय उन्हें अपने बाजू पर एक काला च्योंटा रेंगता दिखाई दिया , वे तुरंत उठ खड़े हुए, पूछने पर यह कहा कि यह च्योंटा ज़रूर कुँए के पास -हाथ मुँह धोते वक़्त उनके साथ चला आया होगा, उसे उसके घर वापस छोड़ना ज़रूरी है। एक घरवाले को बेघर करना बहुत बड़ा पाप है।
समाप्त। :)
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